पत्राचार

अंबाला की कालकोठरी से

(1)
दिनांक 28-08-1948
चि. अप्पा को अ.आ.
आपके छुटकारे का हाल समझा। सिर्फ मेरे बंधुत्व के नाते के ही कारण आपको 7-8 महिनों तक कारागृह में दिन बिताने पड़े। छुटाकरा पाकर बाहर आने के बाद आपके चरितार्थ का मनचाहा धंधा, जो कि अच्छी परिस्थिति में था, छिन्न-भिन्न हुआ है ऐसा ही आपको देखना पड़ा। आपकी सहायता करने वालों की संख्या बहुत ही घट गयी होगी यह स्पश्ट है। इस परिस्थिति से अपको झगड़ना पडे़गा और परिस्थिति आपके बिल्कुल विरूद्ध है। यहां बैठकर भी मुझे यह साफ-साफ दिखता है और सब यह मेरे कारण ही होने के कारण इस पर मैं ज्यादा कुछ नहीं लिख सकता। तो भी अभी जो कुछ प्राप्त हुआ है उसको स्वीकार करके आपको अगला कदम उठाना चाहिये।
कारखाने के बारे में मेरा विचार यह है कि अभी जो कुछ कारखाना है उसको ही चलाने का अधिकार आपको मिलता है या नहीं यह पहले देखना। सब प्रयत्न के बाद कारखाना चलाना असंभव सा हो जाये तो क्या करें इसके बारे में मैं कुछ नहीं सोच सकता, क्योंकि मेरे और बाहर की दुनिया के संबंध टूट ही गये हैं।
ती. तात्या और सौ. मां क्या सोचती होंगी इसकी मुझे कल्पना है। परंतु उन दोनों का भी परमेष्वर पर भरोसा है। इसलिये वही सब घटना का निर्माता है इस तत्व से वे अपना समाधान कर सकेंगे।
मेरी राय के अनुसार आप अब यहां आने की गड़बड़ी न करना। इसके उपर आना हो तो मेरा वक्तव्य कोर्ट में होगा उस समय आना अधिक उचित।
आपका
नाथूराम

(2)
दिनांक 07-10-1948
चि. अप्पा को अ. आ. वि. वि.
सोचता हूं कि दिसंबर के पहले हफ्ते में ही बहुधा न्यायालय का काम पूरा होगा। हमारे यहां की विषेश हालत कुछ भी नहीं।
आपका पत्र पढ़कर समाधान हुआ। दिल पर का एक बोझ उतर गया। आपका कारखाना ही आपका अत्यंत उपुक्त कार्यक्षेत्र है और राश्ट्र का सामथ्र्य देष के कारखानदार तथा संषोधकों पर ही अवलंबिक है। आपके नाम का कुछ विषेश उत्पादन यही आपके जीवन का पहले से ही ध्येय है और उस ध्येय को कारखाने के द्वारा ही आप सफल कर सकते हैं।
आपका
नाथूराम

(3)
दिनांक 12-11-1948
पूज्य माताजी और पिताजी की सेवा में
साादर प्रणाम
तीन-चार दिन पहले न्यायालय में मेरा वक्तव्य हुआ। उसका कुछ भाग वृत्तपत्रों में प्रसिद्ध किया गया है वह आपने पढ़ा ही होगा। इस पूरे वक्तव्य को टाईप करने के लिये 93 अर्ध पृश्ठ लगे। इसके अरितिक्त इसके कुछ विधानों को प्रमाणित करनके के लिये प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, अर्थमंत्री आदि के लेखांषों के करीब-करीब 12 पृश्ठ अगर इनमें मिला दिये तो यह वक्तव्य पूरे 105 पृश्ठार्थ हो गया ऐसा कहने से कुछ प्रत्यवाद नहीं करेगा।
इस वक्तव्य के संपूर्ण पठन को पूरे पांच घंटों का समय लगा। पहले घंटे के बाद मैं पैर उठाने लगा तो खुद को संभाल नहीं सका। षायद बहुत दिनों से व्यासपीठ पर खड़ा न रहने का भी यह असर हो। अगले चार घंटों में ऐसा कुछ नहीं हुआ। बीच में करीब-करीब पंद्रह-बीस मिनटों तक मैंने बैठ-बैठ कर पठन किया लेकिन बाद में फिर से खड़े होकर प्रारंभ किया। हमारे न्यायालय में प्रवेष करा लेना बड़ी मुष्किल है लेकिन मेरे वक्तव्य के दिन तो न्यायालय में बड़े-बड़े सरकारी अफसरों की और अन्य बड़े लोगों की बड़ी भीड़ दिख पड़ी। आरंभ से जो श्रोता मेरा वक्त्व्य सुनने के लिये बैठे थे उनमें से कोई भी पंाच घंटे तक तो गया ही नहीं। लेकिन मेरे वक्तव्य के बाद बड़े-बड़े सरकारी अफसरों ने विषेश आज्ञा पाकर मुझे प्रणाम करके जाने का मौका पाया। काॅफी मेरा बहुत ही प्रिय पेय है यह जानने पर किसी महाषय ने बाद मे तुरंत ही बड़ी अच्छी काॅफी का इंतजाम किया।
न्यायालय में एक अन्य प्रसंग विषेश पर भी मेरे वक्तव्य षक्ति की कसौटी पर परीक्षा हुई अखबारों में इसका प्रकाषित होना असंभव है। क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता के बाद भी हमारे अखबार परतंत्र हैं।
अभी आपको लिखने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है। परंतु खास आपके हृदय पर कितना बोझ है इसकी मैं कल्पना कर सकता हूं। मेरी तरफ से मैं तो यह कह सकता हूं कि जीवन के तत्वज्ञान के बारे में मेरे विचार पूर्णतया स्थिर हैं। अगर यह मान लिया गया कि मनुश्य को उम्र की मर्यादा के आगे का और पीछे का काल यही जीवन की सत्य स्थिति है। और बीच में का काल एक अलग ही सफर है। इसी प्रकार के विचार मेरे मन में प्रतिबिंबित हुए हैं।
मैं चाहता हूं कि आप भी अपनी वृद्वा अवस्था को मन की स्थिरता से वंचित करें। आपके आषीर्वाद से मैं मानता हूं कि किसी को भी उदर पूर्ति के लिये कठिनाई नहीं मालूम पड़ेगी। कुल की कीर्ति या अपकीर्ति के बारे में निर्णय लेना आपके हाथ में नहीं है वरना यह तो समय का अधिकार है।
आपका
नाथूराम

(4)
दिनांक 29-11-1948
प्रिय अप्पा,
कल आपका पत्र मिला उससे कारखाने की हालत के बारे में कुछ जानकारी हुई। और कारखानों की संभाव्य वृद्धि को देखकर संतोश हुआ।
आजकल सरकार की यह नीति दिखाई देती है कि वह यंत्र पूधान धंधों को उत्तेजन देना चाहती है। और अगर स्वतंत्र भारत को सचमुच ही संपन्न करना है तो उसके लिये एक ही मार्ग है। और वह यह कि यंत्र प्रधान व्यवसायों का पोशण और उनकी वृद्धि करना। लेकिन विषेश बात यह है कि चरखा युग के अनके लोप जिन पर चढ़े हुए हैं ऐसे नेता ही यंत्र प्रधान व्यवसायों की प्रषंसा करने लगे हैं।
स्वतंत्र भारत में इन व्यवसायों के क्षेत्र को निर्भयता का स्थान प्राप्त होना बड़ी मात्रा में संभव है। यह जरूर देखा जायेगा कि विदेषी चीजों की स्पर्धा अपने व्यवसायों को मारक न हो। अब इन व्यवसायों को धोखा एक ही बात का है और वह यह कि श्रमिक लोगों को दायित्व षून्य रहने का अवसर देना। श्रमिक लोगों को किसी भी तरह की हानि न पहुंचना और इन व्यवसाय केंद्रों की वृद्धि करना यही नीति हमारे राश्ट्र के लिये हितकारक सिद्ध होने वाली है। श्रमिक और उद्योगपति इन दोनों में सामंजस्य पैदा करने की नीति का अवलंब ज्यादा सुसंबधता से करना आवष्यक है। हां लेकिन यह बात इन व्यवसायों को चलाने वालों के सोचने की नहीं है। उसके लिये सामाजिक कार्यकर्ताओं की राश्ट्र की संपत्ति के संवर्धन की दृश्टि से श्रमिक और उद्योगपति इन वर्गों के बीच सौहाद्र का निर्माण होने की ओर यत्न होना चाहिये।
आपका
नाथूराम

(5)
दिनांक 27-12-1948
प्रिय अप्पा को आषीर्वाद।
अतीव समाधान की बात है कि कारखाना धीरे-धीरे प्रगति की ओर अग्रसर हो रहा है। यहां का वृत इस प्रकार है। न्यायालय में मेरा एक सौ पांच पन्नों का वक्तव्य पढ़ा गया। यह सभी वृत्तपत्रों में संक्षेप में प्रकाषित हो चुका है। उसके बाद सारे अभियोग के पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष की चर्चा का समय आ गया। पूर्व पक्ष की दलीलें मुंबई प्रांत के अडव्होकेट जनरल श्री दप्तरी ने सात-आठ दिनों में पेष की। उनमें मेरे विशय में कुछ विधान आपेक्षित किये गये तभी मुझे मालूम हुआ। अतः मेरी राजकीय भूमिका को फिर से स्पश्ट करने की आवष्यकता मुझे महसूस हुई। मैंने सोचा के यह भाशण मुझे करना चाहिये। अतः मैंने न्यायाधीष को विनती की कि ‘‘मेरी यह इच्छा है कि राजकीय भूमिका के विधेय का भाग मै। ही खुद बोलूं।‘‘ उन्होंने यह कहा या तो अपना सब विधेय तुम खुद ही पेष करो या तो सभी विधेय तुम्हारे वकील से तुम्हारी इच्छा के अनुसार पेष किया जाय। उनके कहने का मतलब था कि कानून के अनुसार दोनों भाशण नहीं आ सकते। तुम्हें या तुम्हारे वकील को एक अतिषय महत्वपूर्ण और उलझे हुए कट के अभियोग में न्यायालय में बोलने का हक है। हर एक षब्द नापतोल कर ही बोलना चाहिये। साथ-साथ इस अभियोग में ओर ही संबंधित हुए हैं जिनका भला-बुरा मेरे साथ ही बंधा हुआ है। मेरे संभाशण की गलतियां दूसरों को भी दूसरों को भी खतरनाक हो सकती हैं। इन बातों केा ध्यान में रखकर अन्य लोग भी मेरे इस निर्णय के खिलाफ थे। इन सब चीजों पर मैंने गौर से विचार किया और अंत में मुझे आत्मविष्वास प्रतीत हुआ कि मैं यह भाशण सफलता के साथ कर सकूंगा।
इस पाष्र्वभूमि को ध्यान में रखते हुए मैं दिनांक पंद्रह बारह अड़तालीस को सुबह साढ़े आठ बजे न्यायालय में प्रवेष किया। न्यायाधीष ने मेरा निर्णय पूछा। मैंने उत्तर दिया कि कानून के अनुसार मेरे वकील का वकालतनामा कायम रख कर के ही अगर मैं भाशण कर सकूं तो मैं कट (शडयंत्र) और मेरी भूमिका इन दोनों विशयों पर भाशण करने के लिये तैयार हूं। मेरा मेरे वकील पर पूरा भरोसा है। मेरी यह इच्छा है कि उनके उपर किसी भी प्रकार की कमी न लगाई जाय। न्यायाधीष ने बताया कि तुम्हारे वकील का वकालनामा कायम रखते हुए भी मैं तुम्हें भाशण देने की इजाजत दे सकता हूं। उसके बाद मैंने मेरा भाशण षुरू किया। मेरा भाशण दो दिनों तक चलता रहा। पहले दिन पांच घंटे और दूसरे दिन करीब-करीब चार घ्ंाटे। कुल मिलाकर नौ घंटे हो गया। यह भाशण किसी कागज से नहीं पढ़ा गया। आखिरी ढेढ़ घंटा छोड़कर बाकि समय मैंने शडयंत्र के बारे में उत्तरपक्ष पेष किया बौर आखिरी डेढ़ घंटे में मैंने मेरी राजकीय भूमिका के विशय में व्याख्यान किया। उपयुक्त समूचा भाशण अंग्रेजी में ही हुआ। पहले डेढ़ घंटे तक आम लोग कुतूहल से और हमारे वकील चिंता से देख रहे थे। उसके बाद सभी लोग एकतान हुए। न्यायाधीष बीच-बीच में प्रष्न पूछा करते थे। आमतौर से उनकी धारणा उत्तेजना की ही थी। मनोविज्ञान और तर्कषास्त्र को लेकर मैंने मेरी दलीलें पेष की थी। प्रत्येक दलील को सबूत दिये। बंबई के अडव्होकेट जनरल की कई दलीलें मैंने सप्रमाण नासाबित सिद्ध की।
इस तरह साढ़े छः घंटे तक अभियोग के शडयंत्र के विभाग में बोलने के बाद आखिरी डेढ़ घंटे में केवल मेरी राजकीय भूमिका के विशय में मैंने अपना विवरण पेष किया। उसका कुछ अंष अखबारों में प्रकाषित हो चुका है। यहां पर मैं इतना लिख देता हूं कि यह भाग अत्यंत प्रभावी हुआ। मेरे इस भाशण की वैषिश्ठपूर्णता यह है कि मेरी तरफ से मैंने न्यायाय की ओर किसी भी चीज की मांग नहीं की थी। दूसरी बात यह है मौत के विकराल रूप में होते हुए भी मैं यह भाशण इस सहजता से कर रहा था कि किसी बाहरी व्यासपीठ पर खड़ा होकर भाशण दे रहा हूं। मेरे भाशण के बाद अडव्होकेट जनरल ने हमारे वकीलों से निवेदन किया कि किसी नामवंत वकील की तरह ही मैंने दलीलें पेष कीं। अडव्होकेट जनरल को मदद के लिये बंबई के दो और दिल्ली के एक वकील हैं। उन्होंने मुझसे मुलाकात की और मेरे इस वक्तव्य के लिये मेरा अभिनंदन किया। मैं जानता हूं कि मेरे भाशण के बारे में खुद मुझे ही लिखना इतना उचित नहीं है। लेकिन दिनांक 20 को राजश्री बनर्जी के भाशण में जब मेरे वक्तव्य का उल्लेख हुआ तब न्यायाधीष ने खुद न्यायालय मे ही बताया कि नाथूराम का विधेयात्मक भाशण बहुत ही अच्छा हुआ। और महत्व की बात है हमारे मुकदमे का जो निर्णय होगा आपसे आपके मन को कुछ प्रतिक्रिया न हो इसलिये तुम्हें अभी से ही सिद्धता करनी चाहिये । हम आज उनके राज्य में रहते है। जो नागरिक स्वातंत्र का डंका बजाते हैं। तब तक बिना फिर्याद के महसूस करने की कला हमें आत्मसात ही करनी होगी।
आपका
नाथूराम

(6)
दिनांक 2-2-1949
चिरंजीव अप्पा को आषीर्वाद।
कल ही अधिकृत रीति से हमंे विदित कराया गया है कि हमारे अभियोग का निर्णय दिनांक दस को जाहीर किया जायेगा। निर्णय के बाद भी प्रत्योत्तर के लिये कुछ समय मिलेगा ही अतः अभी से चिंता करने की कोई जरूरत नहीं। अब हमारा समय विश्रांति और वाचन में चल रहा है। गये सात-आठ सालों में भिन्न-भिन्न व्यवसायों से मेरा वाचन बहुषः छूट ही गया था। किंतु अब वह मैंने फिर से षुरू किया है। न्यायालय का काम जब जारी था तब मैं कुछ ज्यादा नहीं पढ़ सका। लेकिन अब यह बीच का काल कुछ विषेश पुस्तकों के वाचन में मैं बिता रहा हूं। पत्रों का पब्न हर दिन चल ही रहा है। दिनांक 25 जनवरी के ;ैजंजमे उंदद्ध नामक अंग्रेजी वृत्त में ज्ीम ब्मदजतंस ।कअपेवतल ब्वनदबपस व िप्दकनेजतल के अधिवेषन के प्रथम दिन का वृतांत मैंने पढ़ा डाॅक्टर षमाप्रसाद अध्याक्ष थे और उद्घटन पं0 नेहरू ने किया था। नेहीरूजी का भाशण मुझे बहुत ही अच्छा लगा। (……..बल्कि हानिकारक है यह मेरी राय पक्की हुई। इस परिशद ने इस्लामी राश्ट्र के दृश्टिकरण की नीव डाली) लेकिन उनका इस परिशद का एक ही भाशण मुझे बहुत ही अच्छा लगा। इस पत्र में यह बात लिखने की यह वजह है कि इससे यह विदित हुआ कि सरकार को इसकी पूरी जानकारी हुई कि उद्योग धंधे और उत्पादन इनकी ओर सावधान होना परम आवष्यक है। अपने राश्ट्र के कोने-कोने को आधुनिक विज्ञान की सहायता से प्रकाषित करना यही एक चीज है जिससे भारत का बल और और सौख्य बढ़ेगा। यदि हिंदुस्तान की खेती यंत्रों की सहायता से की गई तो सुजलां सुफलां राश्ट्रभूमि को पर्याप्त धान्य की पैदाइष होगी बल्कि यहां से ाहर अनाज भेजा जा सकेगा। भारतीयों के रहन-सहन और आर्थिक स्थिति के सुधार के लिये यहां सब उत्पादन यंत्र-तंत्र से किया जाना चाहिये। यंत्र प्रधान उत्पादन के साथ-साथ ही श्रमिक और उद्योपतियों के सहकार्य का प्रष्न भी काफी महत्वपूर्ण है। तुम खुद एक कारखाने के उत्पादक और संचालक हो। तुम्हारा कारखाना सिर्फ उपजीविका का एक साधन नहीं है इस बात को मैं पूरी तरह से जानमा हूं। आपने कारखाने के चलानें में औस संवर्धन में तुम्हारी प्रेरक षक्ति राश्ट्रीय ध्येयवाद की है। यह बात मुझे और आपके जान पहचान वालों को विदित है। आपकी श्रम करने की तैयाी आपको हमेषा यष देती रहेगी इसमें कुछ षक नहीं है। अब परदेष का माल बाजार में बहुत अधिक मात्रा में आ रहा है। यहां का उत्पादित माल बेचने में कठिनाई होगी यह सवाल कारखानदारों के सामने खड़ा है यह आपका निवेदन मैंने पढ़ा। ओगले और किर्लोस्कर इनकी यु़द्धपूर्व हालत हमारी आंखों के सामने है। और हमारी सरकार स्वतंत्र भारत की होती हुई भी यही सवाल हमारे कारखानदारों के सामने बहुत दिन तक खड़ा रहने वाला है इसमें कोई षक नहीं।
आपका
नाथूराम

(7)
दिनांक 2-2-1949

तीर्थरूप तात्या और ती. सौ. मातोश्री की सेवा में
सादर प्रणाम
हमारे अभियोग के निर्णय के लिये सात-आठ दिन बाकी हैं। इसी बात को ध्यान में रखकर मैं यह पत्र लिख रहा हूं। आप इसको निर्भय और निर्विकार विचारों से पढ़ें उेसी मेरी आपसे सविनय प्रार्थना है। मुझे पूरी कल्पना है कि मेरी वजह से जो विचित्र और भयंकर परिस्थिति निर्माण हुई है उससे आप दोनों को कितना असह्य षारीरिक और मानसिक कश्ट होगा। अंतिम निर्णय के बारे में भी आपके मन में चिंता का बोझ होगा। किंतु उपर्यक्त स्थिति को देखते हुए भी मैं उसके बारे में मामूली सात्वना में कुछ षब्द लिखना योग्य नहीं समझता क्योंकि इन इने-गिने सामथ्र्यहीन षब्दों का कुछ अलग विचार में जानबूझकर लिखना चाहता हूं। उसका कुछ षायद उपयोग हो सकता है। इस लेखन में छोटे की ओर बड़ों को उपदेष दिलाने की कल्पना मौजूद नहीं है।
आप दोनों पापभीरू और धार्मिक प्रवुत्ति के व्यक्ति हैं यह सबको विदित है। मै। नहीं जानता कि अभी आप धार्मिक या तात्विक कौन से ग्रंथ पढ़ते हैं। किंतु मेरी सूचना है कि आप कठोपनिशद् का मराठी तरजुमा पढ़ें। इस उपनिशद में नचिकेतस और यम का संवाद है। इसी संभाशण पर इस उपनिशद में विवेचन किया गया है। हमारा कोई भी तत्व ज्ञान मृत्यु को एक भयानक चीज नहीं मानता।
जिस भयानक परिणाम की ओर मैं आज ताकता हूं और जिस मन स्थिति में मैं आज खड़ा हूं। उस मेरी कृति के पीछे मेरा कौन सा भी वैयक्तिक और कौटंबिक सुख का स्वार्थ तनिक भी नहीं था यह बात मेरे विरोधक भी मानते हैं। नीति तथा आध्यात्मक षास्त्र किसी भी कृति की मूल्य मापन करते हुए उसके पीछे के हेतु का विचार करता है। यही हेतु नैतिक या आध्यात्मिक विवेचन का और विष्लेशण का विशय होता है।
मेरे मन में मनिक भी घबराहट या उदासीनता नहीं है। मेरी तात्विक निश्ठा पर मेरा विष्वास किंचित भी डवांडोल नहीं हुआ। अगर ऐसा होता तो मेरा मन धीरज खो बैठता। और उसकी छाया मेरे षरीर पर भी पड़ जाती। मेरी कृतों के पीछे यही एक हेतु है कि अपने राश्ट्र का स्वातंत्र निरामय रहे और ओर खुले वातावरण में वह बढ़े।
उपर्युक्त दो-तीन चीजों को आप ध्यान में रखें। और एक गंभीर बात भी मैं आपके लिये यहां लिखता हूं। आप दोनों की उम्र आज इतनी अधिक है कि आप और आघात नहीं सहन कर सकेंगे। तो भी मेरी सजा का निर्णय बहुत लोगों के कौतूहल का विशय है। यह दो तत्व प्रणाली का झगड़ा है। कौन सी तत्व प्रणाली प्रभावी साबित होती है यही यही इस झगड़े का सबसे महत्व का निर्णय होगा। बुद्धि प्रधान और विज्ञान पर आधारित तत्व प्रणाली का मैं भोक्ता हूं। यह प्रणाली चारों ओर से उपर उठती हुई मुझे स्पश्ट दिखाई दे रही है। और यही चीज मेरे मन में संतोश पैदा कर रही है। अतः इस झगड़े में मुझे मौत की सजा दी जाती है या मेरा जीव जिंदा रहता है यह एक उपक्षणीय बात है। मेरे व्यक्तिगत किसी निर्णय में आनंद या दुःख निर्माण करने का सामथ्र्य नहीं है इसी मनोवृत्ति को आप अपनायें। थोड़े निर्भयत्व से और मायापाष विरहित होकर अगर आप सोचें तो यह हो सकता है। यही मेरी आपके चरणों में नम्र प्रार्थना है।
आपका
नाथूराम

(8)
दिनांक 15-02-1949
प्रिय अप्पा,
आपने हमारे बारे में दिया हुआ निर्णय 10 तारीख में ही सुना होगा दिनांक 12 को अपने यह भी पढ़ा होगा कि हम सब लोगों ने ‘‘अखंड भारत अमर रहे‘‘ का नारा लगाते हुए अपना दंड पुरस्कार हंसते-हंसते स्वीकार किया। अखंड भारत के ध्येय से प्रेरित होकर आखिर में बलिदान देने की यह घटना षायद आखिरी होगी या हिमाचल और हिंदुकुष पर्वतों से वेश्टित और दक्षिण महासागर तक फला हुआ यह विराट प्रदेष फिर एक बार अपने तेज से सारे संसार को जगमगा देगा यह कहा नहीं जा सकता। सो कुछ भी हो हम सब लोग बड़े आनंद से अपने दिन बिता रहे हैं।
मैं यह जानता हूं कि हम यहां आनंद से रहते हैं और आप लोग जो बाहर हैं उनको ही वास्तव में परिस्थिति के कारण बहुत कश्ट उठाने पड़ते हैं। लेकिन मुझे संदेह नहीं कि आप जानते हैं कि यह भी अपना एक कर्तव्य है। और मैं उम्मीद रखता हूं कि आप इससे च्युत न होंगे।
श्री माधव आपटे और सौ. आपटे बहुत दुःखी हुए होंगे। माधव एक समझदार नौजवान है उसको मेरा प्रणाम कहना उसको यह दिखाना। चिंता करने से या धीरज छोड़ने से उसे ज्यादा नुकसान पहुंचेगा इस बात की उसे पूरी याद दिलाना। धीरज रखकर और दैनिक कार्य अच्छी तरह से करते रहने का उसे उपदेष करना। मैं निष्चित रूप से जानता हूं कि माधव धीरज कभी नहीं छोड़ेगा। आप अच्छी तरह से जानते हैं हमने यह व्रत अंधता से नहीं स्वीकार किया है। अब प्रत्यक्ष कार्य करने का समय आ गया है। इस समय वह सूल ही आपको धीरज दे सकेगा।

आपका
नाथूराम

(9)
दिनांक 15-2-1949
ती.रा.रा. तात्या और ती.सौ. मातोश्री
हमारे अभियोग का निर्णय दिनांक 10 की दोपहर को ही आपको मालूम पड़ा होगा। यह आपने पहले ही सोचा होगा कि कुछ न कुछ अकल्पित या कल्पित घटना सुननी पड़ेगी। लेकिन इसका अंदाज आपको होते हुए भी आपको इस वार्ता से धक्का पहुचा होगा। इस घटना की अपेक्षितता से अनअपेक्षितता का ही धक्का करोड़ों लोगों को पहुचा है। लेकिन अचरज की बात यह है कि जिन लोगों को दी हुई सजा सुनकर ही लोगों का दिल पिघल गया उन लोगों को वह सजा जिस तरह हनुमानजी ने इंद्रबज्र का आघात अपने सीने पर सहन किया उसी तरह बड़े धीरज से यह स्वीकार की है।
मैं उस दिन आपको रूक्का भेजने वाला था लेकिन बीच में दो-चार बिताना श्रेयस्कर मालूम पड़ा इसलिये आज तक ठहर गया।
अब सबसे महत्व की बात यह है कि आप लोगों को अपने षोक को विवेक की मर्यादा में डालना चाहिये।
आपका और सौ मां का ईष्वर पर भरोसा है। अपनी परमेष्वर के बारे में कल्पनायें कुछ समय तक अलग रख देता हूं। लेकिन जिन लोगों का ईष्वर पर भरोसा है उनकी दृश्टि से भी परमेष्वर जो कुछ करता है वह विष्व के भले के लिये करता है। विष्व का बुरा करने की कल्पना से तो विष्व लीला नहीं चल रही और इस परमेष्वर लीला में जिस प्राणी मात्र के लिये जो कुछ हिस्सा निष्चित किया गया है उसे आनंद से स्वीकार करे यही ईष्वर भक्ति है। सुख में ईष्वर को धन्यवाद देना और दुःख में उसे कोसना यह मायापाष में जकड़ी हुई भक्ति है। सुख में और दुःख में निश्काम भक्ति करना ही सबसे उंची भक्ति समझी जाती है। गांधारी के तकदीर में अपने 100 बच्चों को देखते हुए मरना था। भारत के वनपर्व के पन्ने-पन्ने पर हम पुत्रों के हाल देखते हैं। मनुश्य की विवेक बुद्धि के अनुसार राश्ट्रभक्ति इंसान की षुद्ध हेतू से ही गयी है या नहीं वह भी मानव समाज के हित के लिये की गयी है यह देख लिया कि उसके परि म या फल पर अपना सुख या दुःख अवलंबित रखने का कुछ कारण नहीं है।
हमारी वृत्ति पहले जैसी ही आनंदी और गंभीर है। चिरंजीन गोपाल की प्रकृति और वृत्ति भी अच्छी है। हमारे अभियोग का निर्णय अन्याय है। और इससे कायदे पंडित सहमत हैं। और इसी आधार पर हमने वह मुकदमा वरिश्ठ न्यायालय में पेष करने का निष्चय किया है। इसका सब इंतजाम ठीक चल रहा है।
वरिश्ठ न्यायालय में मैंने मेरा मुकदमा खुद ही चलाने का निष्चय किया है। दूसरों के लिये बड़े-बड़े बैरिस्टर चुने गये हैं।
चि. अप्पा और सौ. सिंधू ये दोनों भी विकार के पक्के हैं यह मैं निष्चित रूप से जानता हूं। वे षायद दो दिन तीन दिन तक उदास हो गये होंगे। लेकिन जल्द ही अपना तोल समझकर उन्होंने अपने दैनिक कार्यक्रम षुरू किये होंगे।
आपका
नाथूराम

(10)
दिनांक 18-03-1949
प्रिय अप्पा,
मैंने बहुत दिनों से आपको खत भेजा नहीं। क्योंकि हमें उच्च श्रेणी के कैदी मानने जाने के लिये मैं जतन करता था। अब उसका अनुकूल निर्णय होने के कारण अन्न, कपड़े इत्यादि के बारे में चिंता करने का कारण नहीं।
मैं पूरी तरह जानता हूं आपको कौन सी परिस्थिति से दिन बिताने पड़ते होंगे।
देहदंड की सजा से मेरा या हमारा चित्त जरा सा भी विचलित नहीं हुआ। जिस दिन मुझे गाढ़ी नींद आयी नहीं ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरा। मुझे जो कुछ चिंता है वह सिर्फ कारखाने की, क्योंकि इस कारखाने के ़द्वारा आप देष की प्रति को सहायता देंगे ऐसी मुझे उम्मीद है।
मामूली बातें लिखकर मैं माता-पिता की सात्वना करना नहीं चाहता। भगवद्गीता में से सिर्फ नीचे के ष्लोक का जिक्र करता हूं –
‘‘व एनं वेत्ति हंतार‘‘
फैसले की कापी पढ़कर अब फिर से संपूर्ण मुकदमे का अभ्यास करता हूं। कोर्ट में हमारे पक्ष का समर्थन करने के लिये बहुत से पाईंट्स मिलते हैं। अदालत में मेरे पक्ष का समर्थन मैं सफलता से करूंगा ऐसी मुझे आषा है। निर्णय क्या होगा इसको सोचने का मुझे बिल्कुल कारण नहीं।
अब यहां मिलने के लिये आने में पैसे का और समय को व्यर्थ न कीजिये। हाईकोर्ट में जब मुकदमा षुरू होगा उस वक्त आना ठीक होगा। दूसरों के लिये वकीलों का प्रबंध हो रहा है। उसके बारे में चिंता न कीजिये।
आपका
नाथूराम

(11)
दिनांक 10-04-1949
प्रिय गोविंद,
अब हम अंबाला आ गये हैं। यह जगह षिमला से बिल्कुल नजदीक है। हमारे दिन खुषी से गुजरते हैं। प्रिय अप्पा के पिछले सत्र से उनके दिल पर गहरा परिणाम हुआ है ऐसा दिखता है। यह स्वाभाविक ही है। पिछले साल उनका बताया हुआ धीरज अतुलनीय था। उनके दिल की मजबूती पर ही हम निर्भर हैं।
मुकदमे का अभ्यास करने में मैं ग्रस्त हूं, क्यांकि हमारी अपील की नजदीक आ रही है।
उच्च श्रेणियों के बंदियों की तरह हमारा बर्ताव रखा जाता है। हमारी हालत ठीक है। मेरे प्रष्न का जवाब भेजने की प्रार्थना श्री.ग.वि. केलकर को करने के लिये सिंधू से कहना।
आपका
नाथूराम

(12)
सेंट्रल जेल
अंबाला 15 जून, 1949
प्रिय अप्पा,
अदालत में मुकदमे की कार्रवाही पूरी हुई है। मुझसे मिलने के लिये यहां न आइये। बंबई प्रांत में हमारा रद्दोबदल करने की मांग का फैसला तुरंत ही होगा।
मुझमें और गांधी के पुत्र श्री रामदास गांधी में अब मनोरंजक पत्र व्यवहार षुरू है। श्री विनोबाजी भावे और किषोरीलाल मधूवाला को साथ लेकर मुझसे मिलने का और चर्चा करने का उनका इरादा दिखता है। यह भेंट हुई तो वह मजे की तथा महत्व की भी ठहरेगी। उनको भेजे हुए मेरे जवाब वैषिश्ट्यपूर्ण हैं। उनकी भेजे हुए मेरे विचार वैषिश्ट्यपूर्ण हैं। उनकी कापियां मैं आपको भेज दूंगा। इस तथाकथित मुकदमे से दो व्यक्ति निर्दोश छूट गये यह यष भी छोटा नहीं है।
तात्या और मां की मनःस्थिति के बारे में मुझे दुःख होता है। लेकिन आप वहां हैं ही। आप में से कोई दया की अर्जी न भेज दें। क्योंकि वह मेरी मनोभावना के खिलाफ होगा। कितने भी व्यक्ति फांसी दे दिये गये तो किसी भी परिस्थिति में तत्व की पायमाल्ली न किया जाय। ‘‘पूंजीवाद और समाजवाद‘‘ के संबंध में जाॅर्ज बर्नार्ड षा की किताब मैं हाल में पढ़ता हूं। किताब मनोरंजक होते हुए भी प्रतिपादन सुबोध और स्पश्ट है। मेरी मनःस्थिति के बारे में फिर लिखने की आवष्यकता नहीं। कायदे के अंग को ध्यान में रखते हुए बोलना हो तो उसके बारे में मुझे जरा सी भी चिंता नहीं। और अन्य विशयों के बारे में मैं पर्वत से भी ज्यादा मजबूत हूं।
आपका
नाथूराम

(13)
अंबाला 16 जुलाई, 1949
प्रिय गोविंद,
हायकोर्ट के फैसले की कापियां मुझे कल मिलीं। गोपाल की सजा कम करने की सिफारिष तीनों जजों ने की है। यह भी कुछ कम नहीं।
अपने पक्ष के समर्थन में किये हुए मेरे भाशण के बारे में न्यायमूर्ति ने नीचे के उदगार प्रकट किये हैं –
‘‘पृश्ठ 204 – उसने अपनी अपील खुद चलायी। मुकदमे का इतना गहरा अभ्यास उसने किया था कि बिल्कुल मामूली तपसील की बातें भी उसके हाथ का खिलौना थीं। यह बात ऐसी है कि जिस पर कोई भी वकील गर्व करेगा।
पृश्ठ 206 – वह मैट्रिक भी नहीं हुआ है। तो भी उसका वाचन विषाल है। कोर्ट में अपील चलाते समय अंग्रेजी भाशा का ज्ञान अच्छा दिख पड़ा। उसके विचार सुस्पश्ट थे।‘‘
वरिश्ठ न्यायालय की तरफ जायें या ना जायें इसका मैंने अब तक विचार नहीं किया। मेरी तबियत अच्छी है, और संपूर्ण आनंद में मेरे दिन गुजरते हैं। कारखाने के बारे में मुझे बार-बार समझाइये। खोदा हुआ कुआं व्यर्थ हो जाने के कारण ट्यूबवेल का उपयोग करना आप पसंद करते हैं ऐसी दिखता है। वह काम पूरा होते ही मुझे मालून कीजिये।
ती. तात्या तथा सौ. मातुश्री को नमस्ते। सौ. सिंधु तुम्हारी क्या मदद करती है ? उस पर कार्यालय का दायित्व नहीं। गोपाल की चिंता न कीजिये। यहां अब गरम हवा नहीं।
आपका
नाथूराम

(14)
सेंट्रल जेल
31 जुलाई 1949
प्रिय गोविंद,
सौ. सिंधु का खत मिला। आपने समाचार पत्र में पढ़ा होगा कि मुझे वरिश्ठ न्यायालय की तरफ अर्जी भेजने की संमति मिली है। पहले से ही मैं फिर एक बार प्रयत्न करने के खिलाफ था। इस केस में हमारे खिलाफ गृहीत मानी हुई ऐसी बहुत सी बातें हैं। सब कुछ मेरे अकेले के ही मत पर अवलंबित नहीं है। उमना ही महत्व दूसरों के विचारों का भी है। इसलिये मैंने उनके अनुसार ही सोच-विचार करके श्री गणपतराय से उचित कार्यवाही करने को कहा है। मेरे बचाव का भाशण केवल मैं ही करूंगा इतना मात्र कह दिया है, और लंदन के वकीलों की तरफ से उचित प्रबंध करने के लिये भी विनती की है। ये सब बातें होने के लिये कम से कम आठ एक महिने लगेंगे।
इस जगह हमें कौन सी भी तकलीफ नहीं है। अपने प्रांत में न होने के कारण हम मिल नहीं सकते, इसलिये आपको, तात्या को और सौ. मातुश्री को दुःख होगा इतना ही।
परंतु दूर के रण मैदान पर लड़ने वाले सैनिक अपने सगे संबंधियों से कितने साल तक मिल नहीं सकते उसका कर्तव्य उन्हें पूरा करना पड़ता है न ? आपमे ंसे कोई भी मुझसे अभी मिलने की जल्दी न करे। पत्र के जरिये होने वाली अपनी भेट इस वक्त काफी है। मेरा कहना आपको पसंद आना मुष्किल है परंतु उसका मतलब आप जानते ही हैं।
आप अपना पूरा ध्यान कारखाने को बढ़ाने की ओर केंद्रित करें। आने वाली अड़चनों से मुकाबला करके भी यह करना यही ठीक रास्ता है।
संस्कृत व्याकरण का अभ्यास फिर करने की इच्छा है। इसलिये भंडारकर की तीनों संस्कृत किताबें भेज दें।
हमारे मुकाबले का निर्णय कुछ भी हो। तत्व का प्रष्न होने के कारण उसको ही पायमाल करना और षरणागत हो जाता मुझे ठीक नहीं लगता।
ती. तात्या, सौ. मातुश्री और दूसरे सभी को नमस्ते।
आपका
नाथूराम

(15)
30 अ. 1848
चि. अप्पा,
आपके भेजे हुए कारखाने के संबंध के खत-पत्र पढ़कर खुषी हुई। आपके कारखानों के कटलरी चीजें निकलने लगी। यह तो बहुत ही अच्छा लेकिन जिता चाहिये उतना पैसा ;ब्ंचपजंसद्ध उभारना बहुत ही कठिन सा दिखता है। पिछले अठारह महिनों के हिसाब से इतना नुकसान दिखता है कि किसी को भी इसमें पैसा लगाना भारी सा होगा। इसलिये थोड़ी चिंता है।
मैं सोचता हूं कि अकेले आपके प्रयत्न से ही और तीन एक बरासों में कारखाना स्वयं सिद्ध होगा। लेकिन एक सिर पर इतना बोझ क्या ज्यादा नहीं है ? परिस्थिति को सुधारने का एक ही मार्ग मुझे सूझता है, और वह यह है कि माल का उत्पादन बढ़ाना। मेरी कल्पना के अनुसार सान भर में कम से कम एक लाख का माल तैयार होना चाहिये तो कारखाना अपने पैरों पर खड़ा रह सकेगा।
चाकू इत्यादि चीजे आनप कब तैयार करेंगे ? क्या चमचे, कांटे वगैरह कुछ नहीं हो सकता ? सौ. सिंधु के खत से समझता है कि कारखाने में तैयार हुआ चाकू बहुत ही अच्छा था। वास्तव में मैं जो सूचनायें करता हूं वे बहुत ही दूर से करता हूं, खास देखकर नहीं। जो उचित हो उसके करने के लिये आप समर्थ हैं।
गोपाल के बारे में मैंने कुछ मुद्दे निकालकर श्री गणपतराय के यहां रखाना किये हैं। गोपाल के पक्ष ठीक विचार हायकोर्ट ने किया नहीं ऐसा मेरा मत है। देखें अब क्या होता है। सभी को नमस्ते।
आपका
नाथूराम

(16)
14 अक्टूबर 1949
प्रिय अप्पा,
बहुत दिनों के बाद पत्र लिखता हूं न ? वरिश्ठ कोर्ट का निर्णय निष्चित ही था, इसलिये उसका मेरक दिल पर थोड़ा सा भी परिणाम होने का संभव नहीं। आप पर जो परिणाम हुआ है वह तुरंत ही दूर होगा और आप अपने व्यवसाय में मग्न हो जायेंगे ऐसी आषा है।
सरकार का अंतिम निर्णय समझने के बाद आपको और सौ. सिंधू को मुझसे मिलने के लिये आनें में हर्ज नहीं। आपको पहले मालूम किया जायेगा ही। लिखना निश्ठुरता होगी, लेकिन ती. तात्या और सौ. मां न आऐं। अब प्रवास में ज्यादा तकलीफ होती है। जेल के जीवन से आपका अभी का बाहर का जीवन ही ज्यादा कश्टदायक है परंतु केवल धीरज ही आपको पार जाने के लिये सहायता देने वाला है।
थोड़े ही दिनों में सब कुछ पूरा होकर ‘‘सब ठीक‘‘ हो जायेगा। लेकिन यह सब बाद में, पहले आपके ‘उद्यम‘ के बारे में सोचें। मैं सुनता हूं कि परिस्थिति ज्यादा बिगड़ी होने के कारण पैसा उभाडा नहीं जाता। कटलरी को ज्यादा मांग है। सियालकोट में (अब पाकिस्तान में) इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर होता था। तो क्या इस पर जोर देने से न चलेगा ? उत्पादन में पर्याप्त मात्रा में फायदा हो तो उसे करना ही ठीक है। ज्यादा नुकसान होते ही अद्यावत कारखाना और मनोहर के जैसा लायक आदमी यह भी संतोश की बात है। आप लोग उचित मार्ग निकाल सकें तो मुझे मालूम करेंगे ही।
सगे-संबंधी और दोस्तों के सहवास का स्मरण बार-बार होता है, लेकिन उस कारण से यहां का जीवन दुःसह होता है ऐसा बिल्कुल नहीं। मेरी कृति का पूरा उत्तरदायित्व और बाद का परिणाम ये मुझे दिखाते थे, याने उसको मेरी तैयारी थी ही।
15 अगस्त 1947 के बाद (विभाजन के बाद) मैं नाराज था और होने वाली दुर्दषा को हटाने के लिये असमर्थ था। इसलिये मैंने सोचा कि इस प्रकार की जिंदगी से जेल का जीवन ज्यादा अच्छा!
उस समय की परिस्थिति के अमानुश कृत्यों के जोड़ का उदाहरण इतिहास में दूसरा न हुआ होगा। इस प्रकार के दिन देखने का दुर्भाग्य लाखों लोगों का था।
आज परिस्थिति बदल गयी है। सुधार भी हो रहा है तो भी मार्ग अंधकारमय होने के कारण आपकी बहुत सी षक्ति खर्च होगी ऐसा दिखता है। मै। मझता हूं कि मेरे मित्र मुझे जानते हैं वे आपकी मदद करेंगे ही।
आपका
नाथूराम

(17)
15 अक्टूबर 1949
परम प्रि. पंडित बखले को
स.न.वि.
आपकी भेजी हुई किताबें मिलीं। आभारी हूं। जेल की दिवारों के अंदर कई बार समय यह एक चेतना रहित निष्चिल चीज सी प्रतीत होती है परंतु किताबें पास हो तो आपकी फिक्र किसे ?
वरिश्ठ न्यायालय का फैसला हो चुका है। और कुछ दिनों की अवधि में स्थलकाल की मर्यादा को तोड़कर मैं दूसरे किनारे जा पहुंचुंगा।
यह प्रवास मानव को अगम्य रह गया है, अतः उसके बारे में मन में केवल उत्सुकता भर रही है।
संपूर्ण आनंद से मृत्यु का-चाहे तो नये जीवन का बोलिये स्वागत करने के लिये मैं सिद्ध हूं।
मैं नहीं सोचता कि मुझे मेरे दोस्तों से या सगे-संबंधियों से चार षब्द बोलन को मिलेगा। परंतु उसके लिये दुःख करने का अब कुछ भी कारण नहीं, क्योंकि कब न कब आयुश्य का अंतिम दिन निकलेगा ही। क्या अपना तत्वज्ञान यह कहता नहीं कि मृत्यु से-वह चाहें फांसी के रूप में या किसी भी तरह सामना करने को हमेषा सिद्ध रहें।
मैं नहीं जानता कि मैंने कभी वैयक्तिक स्वार्थ के लिये किसी का द्वेश किया हो। और अब भी मेरे बुरे दिन आयेंगे इस हेतू से किसी का द्वेश करने का कारण मुझे नहीं दिखता। न्याय देवता ने अपने मत के अनुसार जो उचित था वह निर्णय दिया है और ऐसा दिखता है कि वरिश्ठ न्यायालय का भी ‘‘खून का बदला खून‘‘ के न्याय से समाधान हुआ है। सैकड़ों बरसों के ज्ञान का यही परिपाक। षासकों से इस न्याय का अवलंब निःपक्षपात से किया जायेगा और अयोग्य स्थान पर दया की जगह न मिलेगी यही मुझे समाधान ! अनावष्यक सच्चादि और अयोग्य स्थान में दया ये किसी गरीब समाज के जीवन को हमेषा विघातक होती है। षंतताप्रेमी लोगों के दिल में योग्य और न्याय दयादृश्टि का बीज उगना चाहिये।
एक बात अंतःकरण में फिरफिर आती है। विभाजन के बाद के स्वतंत्र हिंदुस्तान में का मैं कैदी हूं। यह अंतिम उदाहरण हो जाये। अब जनतंत्र षासन को पुकार षुरू है। ऐसी दरिस्थिति में जनतंत्र षासन के खिलाफ गैर कानूनी बर्ताव होना अनुचित है।
सब दोस्तों को प्रणाम चाहिये। आपने जो किताबें भेजी इसलिये फिर एक बार आभार।
आपका
नाथूराम

(18)
दिनांक 20-10-1949
ती. तात्या को
कृ,षि.सा.न.वि.
आपका पत्र मिला। अब मेरा सारा वक्त पढ़ने में जाता है। चि. गोपाल ने अधिक से अधिक भगवदगीता कंगत की है। यहां हमारी रहने की और भाकजन की व्यवस्था बहुत ही अच्छी है। चि. माधव मिलने के बाद आपसे कहेगा ही।
आप अपना दिल कड़ा करते रहते हैं ऐसा मैं समझता हूं। ती. सौ. मां में भी ज्यादा धीरज है। मालूम होता है कि गवर्नर जनरल राजाजी से मिलने के लिये आप जाने वाले हैं। मेरी आपसे प्रार्थना-आप यह न कहें। ऐसा करने वाले दूसरे बहुत हैं। सरकार की इच्छा हो तो विचार करने के लिये वास्तव में जगह है। यह मामूली केस नहीं। आपको संषय मे दिन बिताने पड़ेंगे और यह तो बहुत ही मुष्किल परंतु भगवान का अपको और सौ. मां के जैसी निरपराध व्यक्ति को सताने में कुछ हेतु होगा ही। और एक महिन में निर्णय लगेगा और बाद में आपके यहां के आने के बारे में तय किया जायेगा। गोपाल के बारे में श्री ईनामदार के प्रयत्न षुरू हैं। हमारे दिन खुषी से गुजरते हैं। दूसरों में से किसी को भी चार बरसों से अधिक समय तक जेल में रहना न पड़ेगा ऐसा लगता है। सभी को प्रणाम!
आपका
नाथूराम

(19)
दिनांक 9-11-1949
प्रिय तात्या,
चि. गोपाल को और मुझको भेजे हुए आपके खत मिले। आपके उपदेष का बराबर पालन करूंगा। मैं पूरा षांत चित्त हूं, उसमें कौन सी भी हलचल नहीं। आपका तत्वज्ञान भी वही है। मैंने धीरज छोड़ा नहीं।
सचमुच आपको तथा सौ. मां को बड़ा दुःख हुआ होगा। परंतु भगवान के उपर भरोसा रखने वाले आपको यह स्वाभाविकता से ज्ञात होगा कि सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार होता है।
मेरा आज तक का जीवन दुःसह या निकम्मा न था यह आप जानते हैं। अनेकों ने उसकी प्रषंसा ही की थी। इतना होते हुए भी कौन सी अज्ञेय षक्ति ने मुझे यह कृत्य करने को सिद्ध किया होगा ? आपके जैसे भगवान पर दृढ़ निश्ठा रखने वाले के दृश्टि में सोचना हो तो – तो उसकी ही इच्छा दूसरा क्या ? मेरी दृश्टि से वह परिस्थितिजन्य एक मानसिक उद्रेक ही था। आपको मालूम है कि किसी भी प्रकार के स्वार्थी हेतु से मै प्रेरित न था। इस प्रकार का उसका मूल और आज की परिस्थिति की वही पाष्र्वभूमि होने के कारण मेरा धीरज छूटा नहीं। दिवारों के अंदर का जीवन बिताने में भी मेरा चित्त विचलित नहीं हुआ।
मैं सोचता हूं कि उपर लिखा हुआ सब पढ़कर आपका दुःख थोड़ा कम होगा और आपके षरीर को और मन को षांति मिलने के लिये मदद होगी।
आपका
नाथूराम

(20)

(पं. नाथूराम विनायक गोडसे का माता-पिता की दिनांक 12-11-1949 का अंमित पत्र)
अंबाला दिनांक 12-11-1949
परम वंदनीय माताजी और पिताजी,
अत्यंत विनम्रता से अंतिम प्रणाम।
आपके आषीर्वाद विद्युत संदेष से मिल गये। आपने आज के आपके प्रकृति और वुद्धावस्था की स्थिति में यहां तक न आने की मेरी विनती मान ली इससे मुझे बड़ा संतोश हुआ है। आपके छायाचित्र मेरे पास है और उसका पूजन करके ही मै। ब्रह्म में विलीन हो जाउंगा।
लौकिक और व्यवहार के कारण आपको तो इस घटना से परम दुःख होगा इसमें कोई भी षक नहीं है। लेकिन मैं ये पत्र कोई दुःख के आवेग से या दुःख की चर्चा के कारण नहीं लिख रहा हूं।
आप गीता के पाठक हैं, आपने पुराणों का अध्ययन भी किया है।
भगवान श्रीकृश्ण ने गीता का उपदेष दिया है और वही भगवान ने राजसूय यज्ञभूमि पर, युद्धभूमि पर नहीं-षिषुपाल जैसे एक आर्य राजा का वध अपने सुदर्षन चक्र से किया है। कौन कह सकता है कि श्रीकृश्ण ने पाप किया है। श्रीकृश्ण ने युद्ध में और दूसरी तरह से भी अनेक अहंमन्य और प्रतिश्ठित लोगों की हत्या विष्व के कल्याण के लिये की है। और गीता उपदेष में अर्जुन को अपने बांधवों की हत्या करने के लिये बार-बार कहकर अंत में प्रवृत्त किया है।
पाप और पुण्य मनुश्य के कृति में नहीं, मनुश्य के मन में होता है। दुश्टों को दान देना पुण्य नहीं समझाा जाता। वह अधर्म है। एक सीता देवी के कारण रामायण की कथा बन गयी, एक द्रौपदी के कारण महाभारत का इतिहास निर्माण हुआ।
सहस्त्रावधि स्त्रियों का षील लूटा जा रहा था। और ऐसा करने वाले राक्षसों को हर तरह से सहाय करने के यत्न हो रहे थे। ऐसी अवस्था मे अपने प्राण के भय से या जननिंदा के डर से कुछ भी नहीं करना मुझसे नहीं हुआ। सहस्त्रवधि रमणियों के आषीर्वाद मेरे भी पीछे है।
मेरा बलिदान मेरी प्रिय मातृभूमि के चरणों पर है। अपना एक कुटुब या कुछ कुटुंबियों के दृश्टि से हानि अवष्य हो गयी। लेकिन मेरी दृश्टि के सामने छिन्न विभिन्न मंदिर, कटे हुए मस्तकों की राषि, बालकों की कू्रर हत्या, रमणियों की विडंबना हर घड़ी देखने में आती थी। आततायी और अनाचारी लोगों को मिलने वाला सहाय तोड़ना मैंने मेरा कर्तव्य समझा।
मेरा मन षुद्ध है। मेरी भावना अत्यंत षुद्ध थी। कहने वाले लाख तरह से कहेंगे तो भी एक क्षण के लिये भी मेरा मन अस्वस्थ नहीं हुआ। अगर स्वर्ग होगा तो मेरा स्थान उसमें निष्चित है। उस वास्ते मुझे कोई विषेश प्रार्थना करने की आवष्यकता नहीं है।
अगर मोक्ष होगा तो मोक्ष की मनीशा मैं करता हूं।
दया मांगकर अपने जीवन की भीख लेना मुझे जरा सा भी पसंद नहीं था। और आज के सरकार को मेरा धन्यवाद है कि उन्होंने दया के रूप से मेरा वध नहीं किया। दया की भिक्षा से जिंदा रहना यही मैं असली मृत्यु समझता था। मुत्युदंड देने वाले में मुझे मारने की षक्ति नहीं है। मेरा बलिदान मेरी मातृभूमि अत्यंत प्रेम से स्वीकार करेगी।
मुत्यु मेरे सामने आया नहीं। मैं मृत्यु के सामने खड़ा हो गया हू। मैं उनके तरफ सुहास्य वदन से देख रहा हूं और वह भी मुझे एक मित्र के नाते से हस्तांदोलन करता है।
आपलें मरण पाहिले म्यां डोळा
जो जाहला सोहळा अनुपम।।

(जातस्यहि धृवो मृत्युधु्र्रवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्ये न त्वं षोचितुमर्हसि)
भगवदगीता में जीवन और मृत्यु के समस्या का ही ष्लोकों में भरा हुआ है। मृत्यु में ज्ञानी मनुश्य को षोक विह्वल करने की षक्ति नहीं है।
मेरे षरीर का नाष होगा पर मैं अपने साथ हूं। आसिंधु सिंधु भारतवर्श पूरी तरह से स्वतंत्र करने का मेरा ध्येय स्वप्न मेरे षरीर की मृत्यु से मरना अषक्य है।
अधिक लिखने की कोई विषेश आवष्कता नहीं है। सरकार ने आपको मुझे मिलने की अंतिम संधि नहीं दी। सरकार से किसी भी तरह की अपेक्षा न रखते हुए भी वह कहना ही पड़ेगा कि अपनी सरकार किस तरह से मानवता के तत् को अपनायी रही है।
मेरे मित्र गण और चि. दत्ता, गोविंद, गोपाल आपको कभी भी अंतर नहीं देंगे।
चि. अप्पा के साथ और बातचीत हो जायेगी। वो आपको सब वृत्त निवेदन करेगा।
इस देष में लाखों मनुश्य ऐसे हैं जिनके नेत्र से इस बलिदान से अश्रु बहेंगे। वह लोग आपके दुःख में सहभागी हैं। आप आपको स्वतः को ईष्वर की निश्ठा के बल पर अवष्य संभालेंगे इसमें संदेह नहीं।

अखंड भारत अमर रहे।
वंदेमातरम्
आपके चरणों को सहस्त्रषः प्रणाम

आपका
नाथूराम

(21)
(श्री नारायण द. आपटे के कुटुंबियों के लिये दिनांक 14-11-1949 के दिन दिया हुआ संदेष)
सौ. भाभी,
ऐसा न समझना कि आपका सौभाग्य नश्ट होता है। आपके पति की पार्थिव आहुति लक्षावधि सौभाग्यवतियों के सौभाग्य की रक्षा के लिये पड़ती है और उन लक्ष्य भगिनीयों के षुभ आषीर्वाद और आपके पति के पीछे खड़े हैं। निःस्वार्थ बुद्धि से जनहित कल्याण के हुए ढाढस और त्याग का महत्व भूल जाए इतना अपना राश्ट्र पिछड़ा हुआ नहीं।
आपका षुभेच्छु
नाथूराम

(22)
दिनांक 14-11-1949
चि. मनोहर को
नमो पुण्यभूमि जियेच्याच कामीं
पडो देह माझा सदा ती नमीमी।।
नाथूराम वि. गोडसे
दिनांक 14-1-1949

(23)
चि. माधव को
हमारा बलिदान मातृभूमि के लिये है। हमारा मृत्यु मृत्यु नहीं।
समिधा है।

नाथूराम वि. गोडसे

(24)
दिनांक 14-11-1949

मुत्यु पत्र
प्रिय बंधो चि. दत्तात्रय वि. गोडसे
मेेरे विमा के रूपिया आ जायेंगे तो उस रूपिया का विनियोग आपके परिवार के लिये करना। रू 2000 आपके पत्नी के नाम पर। रू 3000 चि. गोपाल के धर्मपत्नी के नाम पर। और रू 2000 आपके नाम पर इस तरह से बीमा के कागजों पर मैंने रूपिया मेरे मुत्यु के बाद मिलने के लिखा है।
मेरी उत्तरक्रिया करने का अधिकार अगर आपको मिलेबा तो आपकी इच्छा से किसी तरह से भी उस कार्य को समाप्त करना। लेकिन मेरी एक ही विषेश इच्छा यही लिखता हूं।
अपने भारतवर्श की सीमारेखा सिंधु नही है जिसके किनारों पर वेदों की रचना प्राचीन द्रश्टाओं ने की है।
वह सिंधु नदी जिस षुभ दिन में भारतवर्श के ध्वज की छाया में स्वच्छंदता से बहती रहेगी उन दिनों में मेरी अस्थि या रक्षा का कुछ छोटा सा हिस्सा उस सिंधु नदी में बहा दिया जाय।
यह मेरी इच्छा सत्य सृश्टि में आने के लिये षायद और भी एक दो पीढ़ी का कालावधि लग जाय तो भी चिंता नहीं। उस दिन तक वह अवषेश वैसा ही रखो। और आपके जीवन में वह षुभ दिन न आया तो आपके वारसों को ये मेरी इच्छा बतलाते जाना।
अगर मेरा न्यायालयीन वक्तव्य कभी सरकार बंधमुक्त करेगी तो उसके प्रकाषन का अधिकर भी मैं अपने को दे रहा हूं।
आपका षुभेच्छु
नाथूराम वि. गोडसे
14।11।1949
।जजमेजमक
15.11.1949
ैक दृ ग ग न ग
डंहपेजतंजम प् ब्संेे
मैंने 101 रूपिया आपको दिये हैं जो आप सौराश्ट्र सोमनाथ मंदिर पुनरोद्धार हो रहा है उसके कलष के कार्य के लिये भेज देना।

नाथूराम वि. गोडसे
(15-11-1949 सुप्रभात 7 बजे)

पं. नाथूराम का अंतिम संदेष
करूक्षेत्र और पानीपत के पावन भूमि पर से चलकर आने वाली हवा में, मैं अंतिम ष्वास लेता हूं। पंजाब गुरू गोविंद की कर्मभूमि है भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव यहां बलिदान हुए लाला हरदयाल तथा भाई परमानंद इन त्यागमृतियों को इसी प्रांत ने जन्म दिया।
उसी पंजाब की पवित्र भूमि पर मैं अपना षरीर रखता हूं। मुझे इस बात का संतोश है। खंडित भारत का अखंड भारत होगा उसी दिन खंडित पंजाब का भी पहले के जैसा पूर्ण पंजाब होगा। यह षीघ्र हो यही अंतिम इच्छा है !

आपका
नाथूराम गोडसे
14-11-1949